Tuesday, July 17, 2007

आ जाओ की ज़िंदगी कम हैं

आ भी जाओ के ज़िंदगी कम है
तुम नही हो तो हर खुशी क़म है

वादा कर के ये कौन आया नही
शहर में आज रौशनी कम है

जाने क्या हो गया है मौसम को
धूप बहुत ओर चाँदनी क़म है

आईना देख कर ख़याल आया
आज कल उन की दोस्ती कम है

तेरे दम से ही मैं मुकम्मल हूँ
अब आ भी जाओ के ज़िंदगी क़म है

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