िदल की बस्ती बिखर गयी होती,
की रूह के ये ज़ख़्म भर गाये होते,
एह ज़िंदगी तो आप की अमानत थी वरना,
हम तो कब के मर गये होते!!
ज़िंदगी जैसे एक सज़ा सी हो गयी है,
गम के सागर में इस क़दर खो गयी है,
तुम आ जाओ वापिस ये गुज़ारिश है मेरी,
मुझे शायद तुमहारी आदत सी हो गयी है
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