Tuesday, July 24, 2007

मै क्या क्या न भूल चुका

हमदर्द समझ जिसको मैंने, जख्म दिखाये थे अपने
छिडका नमक उसी ने इतना , मैं दर्द पुराना भूल चुका

मेरे घर की नींव हिला दी, मेरे रोपे पेड की चूलों ने
अब तो तौबा करली भैया, मैं पौध लगाना भूल चुका

कितने लोग मिलते है अब भी, बन कर मेरे अपने से
हाथ मिलाता हूं सबसे पर, दिल का मिलाना भूल चुका

रुकता हूं हर मोड पर लेकिन मुडकर पीछे देखा नहीं
याद तेरी है दिल में लेकिन, वो तेरा ठिकाना भूल चुका

मुहब्बत, अदावत, बेरूखी, वफ़ा अब तो सारे देख लिये
गुजरे हादसे याद हैं मुझको, जिनको जमाना भूल चुका

आईना हूं मैं लेकिन जाने क्यों, अक्श दिखाना भूल चुका
रंग बदलते चेहरे देख-देख कर, रंग में आना भूल चुका

झूठी मुस्कानों के पीछे, जब उठती देखीं लपटें नफ़रत की
प्रेम भरा है रग-रग में लेकिन, मैं प्रेम का गाना भूल चुका

रोने वालों की कदर कहां इस हंसती गाती दुनिया में
समझा इस राज को जबसे, मैं अश्क बहाना भूल चुका

Thursday, July 19, 2007

आपको यादे करता हूँ

याद करता हूँ आपको तन्हाई में
दिल डूबा हैं गमो की गहराई में
हमें मत दूंडो दुनिया की भीड़ में
हम तो मिलेंगे आपको आपकी परछाई में

Tuesday, July 17, 2007

आ जाओ की ज़िंदगी कम हैं

आ भी जाओ के ज़िंदगी कम है
तुम नही हो तो हर खुशी क़म है

वादा कर के ये कौन आया नही
शहर में आज रौशनी कम है

जाने क्या हो गया है मौसम को
धूप बहुत ओर चाँदनी क़म है

आईना देख कर ख़याल आया
आज कल उन की दोस्ती कम है

तेरे दम से ही मैं मुकम्मल हूँ
अब आ भी जाओ के ज़िंदगी क़म है

मैं ओर मेरी तनहाइयाँ

मैं अकेला तो नही था साथ थी मेरी तनहाइयाँ
कुछ उनका वजूद था कुछ थी मेरी परछाईयाँ

प्यार इस कदर बदनाम हो गया था मेरा यारों
की मुछ से पहले जाती थी मेरी रुसवाइयाँ

उसकी मधुर आवाज़ कानो मैं गूँजती थीकुछ इस तरह
जैसे चारों तरफ़ बज रही हों शहनाईयाँ

बेपनाह हुस्न था उनका ये माना हमने
मगर नापनी मुस्किल थी मेरे ईस्क की गहराइयाँ

मैने हर मोड़ पर वफ़ा की उसके साथ
और वफ़ा के बदले मुझे मिली सिर्फ़ बेवफ़ाइयां !

ये सावन

इस बार की बारिश का ये कैसा समा है
तेरी आँखो मैं भी कुछ नशा है

बड़ रही हैं धड़कने
ना जाने होना आज क्या है

बहके से हैं ये क़दम अपने
दिल मैं कुछ तूफ़ान जवान हैं

रख कुछ फ़ासले मुझसे
कहीं हो ना जाए कोई गुनाह हमसे

है कुछ इस बार का ये बेईमान मौसम
कुछ नया सा हैं इस बार का ये सावन.

ये सावन

ये कैसी है इस बार की बारिश
कुछ तो नया सा है ये सावन

पहले तो कभी ना भीगे हम
ना डूबे किसी की आँखों मैं हम

कहीं बह ना जाएँ तेरी बातों मैं
कहीं खो ना जाएँ तेरी बाहों मैं हम

ना तू इतने क़रीब आ
की रोके से भी ना रुके फिर हम

है कुछ इस बार का ये बेईमान मौसम
कुछ नया सा ये इस बार का ये सावन

Monday, July 16, 2007

'Bathroom Singers' are invited on TV

You may not be a good singer, may be you pass on only as a good 'Bathroom Singer', if so here is a chance for you to win Indian Rs 25 lakh (US$ 62,500).

Yes a Hindi movie channel Filmy is looking for a person who can have lots of fun and pocket Rs 25 lakh (US$ 62,500) in the process by combining his singing talent with an entertainment quotient.

Give it a try.


Read More..........'Filmy moods up with 'Bathroom Singer'
िदल की बस्ती बिखर गयी होती,
की रूह के ये ज़ख़्म भर गाये होते,
एह ज़िंदगी तो आप की अमानत थी वरना,
हम तो कब के मर गये होते!!
ज़िंदगी जैसे एक सज़ा सी हो गयी है,
म के सागर में इस क़दर खो गयी है,
तुम आ जाओ वापिस
ये गुज़ारिश है मेरी,
मुझे शायद तु
महारी आदत सी हो गयी है

तेरी याद

छ्लकता है नूर तेरा मेरी आखों से,
तड़प रहा हूँ मैं और अब ये आलम है,
और इंतेज़ार नही होता अब मेरी सासों से,
तुझे चाहने वाले कम न होंगे,
वक़्त के साथ शायद हम न होंगे,
चाहे िकसी को िकतना भी प्यार देना,
लेकिन तेरी यादों के हक़दार िसर्फ़ हम ही होंगे

Friday, July 13, 2007

हे पन्थी पथ की चिन्ता क्या?

हे पन्थी पथ की चिन्ता क्या ?

तेरी चाह है सागरमथ भूधर,
उद्देश्य अमर पर पथ दुश्कर
कपाल कालिक तू धारण कर
बढ़ता चल फिर प्रशस्ति पथ पर
जो ध्येय निरन्तर हो सम्मुख
फिर अघन अनिल का कोइ हो रुख
कर तू साहस, मत डर निर्झर
है शक्त समर्थ तू बढ़ता चल
जो राह शिला अवरुद्ध करे
तू रक्त बहा और राह बना
पथ को शोणित से रन्जित कर
हर कन्टक को तू पुष्प बना
नश्वर काया की चिन्ता क्या?
हे पन्थी पथ की चिन्ता क्या ?

है मृत्यु सत्य माना पाति
पर जन्म कदाचित महासत्य
तुझे निपट अकेले चलना है
हे नर मत डर तू भेद लक्ष्य
इस पथ पर राही चलने में
साथी की आशा क्यों निर्बल
भर दम्भ कि तू है अजर अमर
तेरा ध्येय तुझे देगा सम्बल
पथ भ्रमित न हो लम्बा पथ है
हर मोड खड़ा दावानल है
चरितार्थ तू कर तुझमे बल है
है दीर्घ वही जो हासिल है
बन्धक मत बन मोह पाशों का
ये मोह बलात रोकें प्रतिपल
है द्वन्द्व समर में मगर ना रुक
जो नेत्र तेरे हो जायें सजल
बहते अश्रु की चिन्ता क्या
हे पन्थी पथ की चिन्ता क्या ?

Thursday, July 12, 2007

कुछ कहा अनकहा सा

एक दिन यूँ ही आधी रात को
मेरी हथेली पर लिखा था तुमने
कि गया हुआ वक़्त कभी लौट के नहीं आता
तब से तेरे साथ बीते उन्हीं पलों
को अपने तस्सवुर में जी लेती हूँ मैं

कानो में धीरे से कही थी एक बात
कि यह जो अंधेरा है ज़िंदगी में
यह सिर्फ़ कुछ पल का ही तो है
तब से उन्हीं उजालों की इंतज़ार में
एक-एक पल को गिनती रहती हूँ मैं

थाम के अपने हाथों में हाथ मेरा
मुस्करा के एक बोल कहा था
कि वादा है ता-उम्र साथ निभाने का तुमसे
तब से उन्हीं वादों को अपने आँचल में बाँधे
संवरती सजती ख़ुद में सिमटती रहती हूँ मैं

नज़रों में मेरी झाँक के कहा था
की एक प्यार का संसार है जहाँ तुम हो ,मैं हूँ
किरणों की रोशनी थामे जहाँ चाँद उतर आता है
तब से यूँ ही अपने ख़्यालो में रात की रानी-सी
ख़ुद ब ख़ुद महकती सी रहती हूँ मैं

और यह भी कहा था तुमने की
कुछ सवालो के जवाब ख़ुद वक़्त देता है
तब से अपने हर जवाब को
तेरी कही बातों में तलाशती रहती हूँ मैं ...

Wednesday, July 11, 2007

'मैनें बाप चुना'

जब भी मैनें अपना बाप चुना,
ना जाने कितना कहा सुना।

ईक बाप वहाँ था जब आँख खुली,
मैने उसे कहा 'बा' तुतली तुतली,
पर जाने कहाँ वो चला गया।
माँ कहती रचाया उसने व्याह नया।।

फिर मैने सोचा, कुछ भी हो,
बाप तो चाहिये, इक ना दो।
माँ बोली भगवान अब बाप तेरा,
रक्षक, भक्षक तेरा ओर मेरा।।

पर कैसा बाप है अन्जान गुनी,
ईक बात मेरी उस ने ना कभी सुनी।
तूँ देख ना पायेगा उस को कभी,
तेरा बाप है वो, ये जाने सभी।।

फिर इक दिन गलियों में हुई चर्चा,
बाप बनने चला कोई, निकला पर्चा।
मैं तो पहले ही इस ताक में था,
कोई बाप चुन सकूँ, गर हो ऍसा।।

माँ बोली ये 'बाप' वो नही बेटा,
ये भक्षक है, इसे कहते नेता।
पर मेरे मन में थी आग लगी,
लोगों की बातें सुन कुछ आस बधी।।

बीना सोचे समझे मत दे डाला,
उत्र हुआ आलिंगन को, जैसे कुंवारी बाला।
हुऎ उजागर, शिघ्र ही बाप के दांत,
पेट में आन्तों की बंध गई गांठ।।

मां बोली अब ना इसका उपचार कोई,
सहने होंगे, नऎ अत्याचार कई।
भोगो, इस लाडले बाप का प्यार,
न कहती थी चुनना सब सोच बिचार।।

अब सोचता हूँ, अपना करा-धरा,
ऎसे बाप बीना था क्या रूका पङा।
इस बाप का गला अब कैसे धोटूँ,
तोबा , फिर ऎसे बापों से कर लूँ।।

अब बिन बिचार मत ना दूँगा कभी,
जो सही होगा, और हो जिन्दा दिल भी।
जनता की सोचे, ना अपना पेट भरे,
देश को बांधे, ना इसको गिरवी धरे।।

ये पाँच साल तो कैसे भी पूरे कर लूँगा,
अपना ही दोष जान, सीने पे पत्थर धर लूँ गा।
अगर फिर कभी इस कमीने ने मत मांगा,
इस की तो मैं ऎसी तैसी कर दूँगा।।

सच्चा आईना

सवालों की भीड़ है यहाँ, जवाब नदारद
डरता है दिल मेरा अब अपने ज़ख़्म दिखाने में

वक़्त की दीवार पर लगा वो आईना हूँ मैं
जला है जिसका दिल ख़ुद के मुस्कराने में

निकलेगी न धूप जब तक है बारिश का मौसम
जले हैं लब मेरे भीगी शब को आज़माने में

अश्क़ो की ज़ुबान गीतों में छलक गयी है शायद
कोरे काग़ज़ लगे हैं अभी तक नमी को सूखाने में

देखते-देखते सब अपने , दे गये हैं दर्द नये
हम अब भी लगे हैं झूठी तस्सली से ख़ुद को बहलाने में

शीश महल सा तन था पर मन तो बिल्कुल खंडहर था
फिर भी सजाए ख़्वाब हमने इस दिल के आशियाने में

करेगी ख़ाक चिता की आग ले के अपनी पनाहों में
हम देखेंगे फिर भी राह ख़ुशी की उस अकेले वीराने में !!

कितना भी चाहो भूल नही पाओगे हमें

कितना भी चाहो ना भूल पाओगे हमे
जितनी दूर जाओगे नज़दीक पाओगे हमे
मिटा सकते हो तो मिटा दो यादें मेरी
मगर क्या सांसो से जुदा कर पाओगे हमे?